सिर्फ 4 टेस्ट, 67 रन… फिर भी क्यों खास हैं माधव मंत्री, जिन्हें वानखेड़े में मिलेगा सम्मान?

cricketnmore.com NaN days ago

सिर्फ 4 टेस्ट और 67 रन बनाने वाले माधव मंत्री को वानखेड़े स्टेडियम में मिलेगा सम्मान। जानिए सचिन तेंदुलकर और सुनील गावस्कर के करियर पर उनके प्रभाव की कहानी।

MADHAV MANTRI Story
MADHAV MANTRI Story (MADHAV MANTRI - A Legend Beyond The Records)

वह एक बेहतरीन विकेटकीपर, बॉम्बे के सफल कप्तान, तीन बार रणजी ट्रॉफी जीतने वाली टीम के खिलाड़ी, नेशनल सेलेक्टर और एडमिनिस्ट्रेटर थे। इससे भी खास ये कि क्रिकेट की गहरी समझ थी और इसे सिर्फ मुंबई के दो बड़े बल्लेबाजों, सुनील गावस्कर और सचिन तेंदुलकर तक ही नहीं, इस पीढ़ी के कई क्रिकेटरों तक पहुंचाया। उनका योगदान, उनके टेस्ट रिकॉर्ड से कहीं ज्यादा था।

उन्होंने एक बार बताया था कि सीके नायडू ने उन्हें सिखाया कि विकेटकीपर सिर्फ स्टंप्स के पीछे खड़ा एक खिलाड़ी नहीं, कप्तान का 'दोस्त, सलाहकार और गाइड' भी हो सकता है। इसी समझ ने माधव मंत्री की अपनी लीडरशिप को आकार दिया। 1952 में भारत के इंग्लैंड टूर पर, अंपायर फ्रैंक चेस्टर ने उनकी विकेटकीपिंग की तारीफ की और वे हैरान थे कि भारत ने माधव मंत्री को सीरीज के सभी टेस्ट में क्यों नहीं खिलाया? वे विकेटकीपिंग में सिर्फ कैच लपकने और स्टंपिंग के रोल को नहीं निभाते थे।

1941-42 में रणजी ट्रॉफी डेब्यू किया नॉर्दर्न इंडिया के विरुद्ध बॉम्बे के लिए, मैच में 9 खिलाड़ियों को आउट किया (4 कैच+5 स्टंपिंग) और ये 18 साल तक एक रिकॉर्ड रहा। कुल 42 रणजी ट्रॉफी मैच: 50.67 की औसत से 2787 रन बनाए। 1948-49 में महाराष्ट्र के विरुद्ध एक यादगार मैच में 200 रन बनाए- ये वही मैच है जिसमें कुल 2376 रन बने और 9 शतक लगे। 1951-52, 1955-56 और 1956-57 में बॉम्बे की जिस टीम ने रणजी ट्रॉफी को जीता, वे उसमें थे। ये वे जीत थीं जिन्होंने रणजी ट्रॉफी में बॉम्बे के दबदबे वाले शानदार दौर के लिए भूमिका तैयार की। वे उस पीढ़ी का हिस्सा थे जिसने बॉम्बे क्रिकेट के स्टैंडर्ड और कल्चर को बनाने में मदद की।

वे उस दौर से थे जब भारत के लिए खेलना एक सम्मान मानते थे, न कि प्रोफेशन। 1952 के इंग्लैंड टूर के बारे में उन्होंने कई बार बताया था कि खिलाड़ियों को बड़ा कम अलाउंस मिलता था और यहां तक कि बड़े खिलाड़ियों और टीम के बाक़ी खिलाड़ियों की पेमेंट में भी फर्क होता था।

शायद क्रिकेट में उनका सबसे बड़ा योगदान उनके खेलने के करियर के बाद आया। वे सुनील गावस्कर के मामा थे (वही जिन्होंने बच्चा बदल जाने वाले किस्से में सही सुनील को पहचाना था) लेकिन कभी भी उन्हें, इस रिश्ते को कामयाबी का शॉर्ट कट नहीं बनाने दिया। यहां तक कि जब सुनील अपने मामा की इंडिया कैप पहनना चाहते थे तो वह भी न दी, और साफ जवाब साफ था, 'अपनी इंडिया कैप खुद हासिल करनी होगी।'

सुनील गावस्कर आज तक इस सबक को याद रखते हैं और वे आज के नए खिलाड़ियों को इसकी 'कीमत' का अहसास कराते रहते हैं। इस बात ने सुनील पर इतना असर किया कि सुनील को उनकी इंडिया कैप 1971 के वेस्टइंडीज टूर से पहले ही मिल गई पर उसे किसी टूर मैच में न पहन, इसे पहनने के लिए अपना पहला टेस्ट खेलने तक इंतजार किया।

उन्होंने सुनील गावस्कर को शुरू से संदेश दे दिया था: अपना विकेट कभी आसानी से या सस्ते में न गंवाओ। गेंदबाज को उसे हासिल करने के लिए मेहनत करने दो। इसलिए जब आज के नए किकेटर, इंडिया कैप मिलने के बावजूद अपने खेल में गंभीर नहीं दिखाई देते तो सुनील गावस्कर को गुस्सा आता है। ये था एक 67 टेस्ट रन बनाने वाले खिलाड़ी का उस खिलाड़ी की सोच पर असर जो भारत का पहला महान 10000 टेस्ट रन बनाने वाला बल्लेबाज बना।

माधव मंत्री के टेस्ट डेब्यू के लगभग चार दशक बाद, मुंबई से एक और शानदार टैलेंट का नाम चमका और उन पर भी माधव मंत्री का असर था। 1990 के इंग्लैंड टूर पर गई भारतीय टीम के वे मैनेजर थे और ये वही टूर है जिसमें 17 साल के सचिन तेंदुलकर ने ओल्ड ट्रैफर्ड में, दूसरे टेस्ट में 119* बनाए थे। ये उनका न सिर्फ पहला टेस्ट 100 था, तब किसी भी भारतीय बल्लेबाज का सबसे कम उम्र में टेस्ट 100 भी था।

माधव मंत्री नेशनल सेलेक्टर भी रहे। भारत की टीम में अजीत वाडेकर को चुनने में शामिल रहे। मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन के प्रेसिडेंट और बीसीसीआई के ट्रेजरर के तौर पर भी काम किया। तब भी इस पोस्ट या बीसीसीआई में उनकी भूमिका से ये अंदाजा नहीं लगता कि उनका नाम आज भी खास क्यों है?

माधव मंत्री का 2014 में 92 साल की उम्र में निधन हो गया। तब वे भारत के सबसे बड़ी उम्र के जीवित टेस्ट क्रिकेटर थे। उनका इंटरनेशनल करियर छोटा था, टेस्ट क्रिकेट रिकॉर्ड भी कोई बहुत प्रभावशाली नहीं पर 'खास' थे और इसलिए ही जब वानखेड़े में तेंदुलकर और रहाणे के साथ उनका नाम आ रहा है तो इसे महज एक मुंबई के एक पुराने क्रिकेटर के सम्मान के तौर पर नहीं देखना चाहिए।

ये इस बात की याद है कि क्रिकेट पर किसी के असर को हमेशा रन, विकेट या खेले टेस्ट की गिनती से नहीं आंक सकते। कुछ क्रिकेटर अपने पीछे ढेरों रिकॉर्ड छोड़ जाते हैं, तो कुछ क्रिकेट कल्चर। माधव मंत्री ने अपने तरीके से ये दोनों काम किए और मुंबई क्रिकेट उन्हें पहले के मुकाबले दूसरे काम के लिए शायद ज्यादा याद करता है।